हॉलीवुड की देशभक्ति बनाम भारतीय सिनेमा: ऑस्कर का दोहरा मापदंड | KhabarForYou
- DIVYA MOHAN MEHRA
- 05 Jan, 2026
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यह एक ऐसा विषय है जो न केवल सिनेमा, बल्कि राजनीति, संस्कृति और वैश्विक धारणाओं को भी गहराई से प्रभावित करता है। सोशल मीडिया पर वायरल होने और गूगल सर्च में टॉप पर आने के लिए इसे एक दमदार शीर्षक और आसान भाषा के साथ यहाँ प्रस्तुत किया गया है।
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जब हॉलीवुड की देशभक्ति पर 'ऑस्कर' बरसते हैं, तो भारतीय फिल्मों को 'प्रोपेगेंडा' क्यों कहा जाता है?
क्या आपने कभी गौर किया है कि जब टॉम क्रूज 'टॉप गन: मेवरिक' में अमेरिकी झंडे के नीचे फाइटर जेट उड़ाते हैं, तो पूरी दुनिया इसे "सिनेमाई मास्टरपीस" कहती है? लेकिन जैसे ही 'RRR' में भीम और राम अंग्रेजों के खिलाफ दहाड़ते हैं, तो विदेशी मीडिया के कुछ धड़ों में इसे "अति-राष्ट्रवाद" या "प्रोपेगेंडा" का नाम दे दिया जाता है।
साल 2026 में आकर यह बहस अब और भी तेज हो गई है। आखिर दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योग, भारत, के प्रति यह दोहरा मापदंड क्यों है? चलिए, इस पर्दे के पीछे की सच्चाई को गहराई से समझते हैं।
1. हॉलीवुड का 'देशभक्ति' वाला ऑस्कर फॉर्मूला
हॉलीवुड ने पिछले 80 सालों से दुनिया को यह सिखाया है कि "हीरो" कैसा दिखता है। हम सबने उन फिल्मों पर तालियां बजाई हैं जहाँ एक अमेरिकी सैनिक पूरी दुनिया को एलियंस या आतंकवादियों से बचाता है।
पेंटागन का हाथ और हॉलीवुड का साथ
क्या आप जानते हैं कि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) का एक विशेष विभाग है जो हॉलीवुड की स्क्रिप्ट्स को चेक करता है?
Top Gun: Maverick: इस फिल्म को अमेरिकी नौसेना के एक बड़े विज्ञापन के रूप में देखा गया। नौसेना ने थिएटरों के बाहर भर्ती बूथ तक लगाए थे। इसे 6 ऑस्कर नॉमिनेशन मिले।
American Sniper: एक अमेरिकी स्नाइपर की कहानी जिसे "महान देशभक्ति" बताया गया, जबकि कई देशों में इसे एकतरफा युद्ध चित्रण माना गया।
Argo और Zero Dark Thirty: ये फिल्में CIA की सफलताओं का जश्न मनाती हैं। इन्हें 'बेस्ट पिक्चर' जैसे अवॉर्ड्स से नवाजा गया।
सच्चाई: जब हॉलीवुड इसे करता है, तो इसे "मानवीय जज्बे की जीत" (Triumph of Human Spirit) कहा जाता है।
2. भारतीय सिनेमा का उदय और विदेशी आलोचकों का डर
दशकों तक, पश्चिम ने भारतीय सिनेमा को सिर्फ "गरीबी" और "स्लमडॉग मिलेनियर" जैसे चश्मे से देखना पसंद किया। उन्हें भारत की लाचारी देखने में मजा आता था। लेकिन पिछले कुछ सालों में **एस.एस. राजामौली** जैसे निर्देशकों ने इस धारणा को तोड़ दिया।
'RRR' का विरोधाभास
जब *RRR* ग्लोबल हिट हुई, तो पश्चिमी आलोचकों का एक वर्ग असहज हो गया। उन्होंने सवाल उठाए कि क्या यह फिल्म "बहुत ज्यादा हिंदूवादी" या "राष्ट्रवादी" है?
> सवाल यह है: अगर क्वेंटिन टैरेंटिनो अपनी फिल्म Inglourious Basterds में इतिहास बदलकर हिटलर को मार सकते हैं, तो एक भारतीय निर्देशक अपने क्रांतिकारियों को अंग्रेजों के खिलाफ महामानव (Superhuman) की तरह क्यों नहीं दिखा सकता?
3. तुलना: हॉलीवुड बनाम भारतीय सिनेमा
4. यह दोहरा मापदंड क्यों? (3 बड़े कारण)
क. 'सॉफ्ट पावर' पर एकाधिकार
हॉलीवुड सालों से दुनिया की सोच पर राज कर रहा है। जब भारत जैसा कोई दूसरा देश अपनी कहानियों को उसी भव्यता और गर्व के साथ पेश करता है, तो पश्चिम को अपनी 'सॉफ्ट पावर' खतरे में लगती है।
ख. सादगी बनाम भव्यता (Subtle vs Maximalist)
पश्चिमी फिल्में अक्सर देशभक्ति को "शांत" और "गंभीर" तरीके से दिखाती हैं। इसके विपरीत, भारतीय सिनेमा **'मैक्सिमलिस्ट'** है। यहाँ भावनाएं, संगीत और एक्शन सब कुछ बड़ा (Larger than life) होता है। विदेशी आलोचक अक्सर इस "भव्यता" को गलत समझकर इसे 'एजेंडा' मान लेते हैं।
ग. "व्हाइट गेज़" (White Gaze)
आज भी कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समीक्षक इसी मानसिकता में जी रहे हैं कि केवल पश्चिमी मूल्य ही "यूनिवर्सल" (सार्वभौमिक) हैं। उनके लिए भारतीय वीरता की कहानी "क्षेत्रीय" या "सांप्रदायिक" हो सकती है, जबकि अमेरिकी वीरता "वैश्विक" है।
5. क्या कोई फिल्म बिना 'प्रोपेगेंडा' के देशभक्त हो सकती है?
यह एक बहुत ही बारीक रेखा है।
देशभक्ति: अपने देश के प्रति प्रेम और गर्व।
प्रोपेगेंडा: किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना।
अगर द कश्मीर फाइल्स या द केरला स्टोरी पर बहस होती है, तो हमें यह भी पूछना चाहिए कि वियतनाम युद्ध या इराक युद्ध पर बनी हॉलीवुड की फिल्में कितनी निष्पक्ष थीं? सच तो यह है कि हर फिल्म किसी न किसी का नजरिया होती है। दोहरा मापदंड तब होता है जब हम एक पक्ष की 'एकतरफा कहानी' को ऑस्कर देते हैं और दूसरे की कहानी को 'प्रोपेगेंडा' कहते हैं।
6. निष्कर्ष: अब भारत का समय है
2026 का भारत अब अपनी कहानियाँ सुनाने के लिए किसी के सर्टिफिकेट का मोहताज नहीं है। सिनेमा एक आईना है, और भारत अब उस आईने में अपनी असली पहचान देख रहा है।
अगर हम 'कैप्टन अमेरिका' को ढाल लेकर लड़ते हुए देख सकते हैं, तो हम 'आरंभ' और 'राम' को धनुष और आग के साथ लड़ते हुए भी देख सकते हैं। देशभक्ति पर किसी एक देश का कॉपीराइट नहीं है। समय आ गया है कि वैश्विक सिनेमा की दुनिया भारतीय कहानियों को भी उसी सम्मान के साथ देखे, जिसकी वो हकदार हैं।
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